(सतपाल सिंह सचदेवा) नवाबगंज (गोंडा): केन्द्र एवं प्रदेश सरकारों द्वारा समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास की किरण पहुंचाने तथा उन्हें न्याय दिलाने के दावे को परखना चाहते हैं,तो आइए हम आपको मिलाते हैं नवाबगंज रेलवे स्टेशन के सामने हड्डी पुरवा के मुहाने पर खुले आसमान तले लगभग दर्जनों ऐसे परिवारों से,जिनके सिर पर छत तो दूर,फटे बोरों और पन्नियों के टुकड़े भी नसीब में नही हैं। ……जी हां, ये वो बदनसीब, अति गरीब एवं वंचित परिवार हैं,जिन्हें संपेरा कहा जाता है। मूलतः उतरौला के राज जोत गांव के भूमि हीन संपेरा समुदाय के लगभग दर्जनों परिवार वर्षों से जीवकोपार्जन के लिए कस्बा नवाबगंज और आसपास के गांवों के किनारे खाली पड़ी जमीनों पर अपना अस्थाई आशियाना बनाते चले आ रहे हैं।फटी पन्नियों और बोरों को डंडों से फंसा कर गृहस्थी का सामान संजो कर स्वयं तथा नन्हे मुन्ने बच्चों और परिवार सहित खुले आसमान की छत पर बसेरा करने पर मजबूर हैं। जाड़ा, गर्मी,बरसात और आंधी-तूफान इन परिवारों के लिए अभिशाप बन कर डसते रहते हैं। संपेरा कुनबे के मुखिया 72 वर्षीय जीर्ण शीर्ण बुजुर्ग विजय नाथ संपेरे ने भरी आंखों से अपनी अभावग्रस्त एवं दुःख भरी जीवन यात्रा के बारे में बताया। विजय नाथ के अनुसार आजादी के बाद से अब तक विभिन्न सरकारों एवं नौकरशाहों द्वारा अति गरीब और नारकीय जीवन जी रहे संपेरा समुदाय को सरकारी योजनाओं से वंचित रखा गया है। विजय नाथ ने बताया कि पुश्तैनी गांव में खेती लायक जमीन एवं पक्के मकान के अभाव में जीवकोपार्जन के लिए जहरीले सांपों को पकड़ने और उनके दर्शन से होने वाली आमदनी से दो जून की रोटी जुटाने में ही पूरी जिंदगी होम हो जाती है। पुश्तैनी गांव से लेकर यहां भी सरकारी योजनाओं से वंचित तथा समाज के अन्य वर्गों द्वारा नकारे जाने के कारण हमारा और हमारे परिवारों का वर्तमान एवं भविष्य अंधकारमय है। खुले आसमान के नीचे अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ सांप निकलने की सूचना का इंतजार कर रहे 35 वर्षीय श्याम नाथ उर्फ राजू संपेरे ने बताया कि कई वर्षों से यहां ठहरें हैं।बारिश अधिक न होने से सांप बिलों से बाहर नही निकल रहे हैं। जिसके कारण उनको पकड़कर मिलने वाले पैसों के अभाव में खाने के लाले पड़े हैं।उधर खाली पड़ी जमीन के कोने पर राजू का ममेरा भाई 25 वर्षीय अजूबा नाथ अपनी नई नवेली दुल्हन नन्हिया देवी के साथ वर्तमान की परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए भविष्य के सपने बुन रहा था। अजूबा नाथ ने बताया कि छः महीने पहले हमारी शादी हुई है।सावन माह में पड़ने वाले त्योहारों में श्रद्धालुओं को नाग देवता के दर्शन करा कर एवं सांपो को पकड़ कर साल भर की कमाई होने की उम्मीद होती है। अबकी बारिश कम होने से भविष्य में होने वाली आमदनी भी कम हो गई है। जिसके कारण गृहस्थी चलाना दुरुह हो गया है। बताया गया कि यहां के कुछ संंपेरे प्रातः काल ही क्षेत्र में सांपों को पकड़ने तथा गांव गांव नाग देवता के दर्शन कराने के लिए निकले हुए थे। वहां रहने वाले परिवारों ने दुखी होकर बताया कि अचानक बारिश होने पर गांव के पक्के मकानों के बरामदे में बच्चों पत्नी सहित शरण लेकर भीगने से बचने की कवायद करनी पड़ती हैं। मात्र दो जून की रोटी जुटाने के लिए अपनी जान को जोखिम में डालकर ये फटेहाल अभावग्रस्त संपेरे परिवार न केवल जहरीले जानवरों से लोगों की जान बचाते हैं,बल्कि भगवान भोलेनाथ के गले में सुशोभित नाग देवता के दर्शन करा कर पुण्य लाभ भी दिलाते हैं। ऐसे जीवन दाता संपेरे समुदाय की इस दयनीय दुर्दशा के लिए क्या हमारा समाज भी जिम्मेदार नही है। समाज के आखिरी पायदान तक विभिन्न योजनाओं का लाभ देने और शत् प्रतिशत क्रियान्वयन का दावा करने वाले हमारे जनप्रतिनिधि,सरकारें और नौकरशाह क्या जिम्मेदार नही। संपेरा समुदाय को खेती लायक भूमि,पक्के मकान, शौचालय,पेयजल, उज्ज्वला एवं स्वास्थ्य सहित उन तमाम योजनाओं के लाभ से क्यों वंचित रखा जा रहा है। समाज सेवी मोहम्मद इसहाक रैनी ‘एडवोकेट’ ने खानाबदोश जीवन जीने वाले संपेरा समुदाय की चिंता करते हुए कहा कि इनके बच्चों को शिक्षित करना और सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ देने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना चाहिए। इसका प्रयास हम सब को मिलकर करना होगा। उन्होंने कहा कि हमारे भारत के ही नागरिक संपेरा समुदाय को भी आत्मसम्मान से जीने का अधिकार मिलना चाहिए। उनके बच्चों को भी अच्छी शिक्षा प्रदान करने चाहिए। उनके चहुंमुखी विकास के प्रति उदासीनता अक्षम्य अपराध है।
नवाबगंज रेलवे स्टेशन के समीप हड्डी पुरवा गांव के किनारे पडी खाली जमीन पर खानाबदोश संपेरा समुदाय का खुले आसमान तले आशियाना
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पितृपक्ष के दौरान किसी के घर अन्न-जल क्यों नहीं ग्रहण करना चाहिए….सनातन धर्म में 16 दिन का पितृपक्ष, सबसे संवेदनशील, सबसे सूक्ष्म दिनों का समय माना गया है। गरुड़ पुराण, जो मृत्यु और मृत्यु के बाद के विज्ञान का ग्रंथ है, वह स्पष्ट कहता है – इन 16 दिनों में आपका शरीर केवल आपका नहीं रहता, आप अपने पितरों के लिए एक “पात्र” बन जाते हैं।
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