संगीता गुप्ता/ नेहा सिंह अयोध्या धाम कार्यालय फैजाबाद अयोध्या ब्यूरो प्रमुख की खास रिपोर्ट
अयोध्या धाम की पवित्र परिक्रमा मार्ग पर इन दिनों सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है। लाखों श्रद्धालु, सीमित स्थान और हर क्षण सतर्कता की मांग। ऐसे में वर्दीधारी पुलिसकर्मियों से आमजन अक्सर कठोरता और अनुशासन की ही अपेक्षा रखते हैं। परंतु शनिवार को देखने को मिला एक ऐसा दृश्य, जिसने यह याद दिला दिया कि वर्दी केवल कानून की प्रतीक नहीं,मानवता की भी संरक्षक है।पुलिस अधीक्षक ग्रामीण बलवंत चौधरी ने जब सड़क के बीच अकेले रह गए एक छोटे बच्चे के खोमचे को स्वयं उठाकर किनारे रखवाया, तो यह काम किसी आदेश का पालन नहीं था,यह कर्तव्य से ऊपर उठी करुणा का परिचय था।जहाँ किसी और की नजर उपद्रव पर पड़ती, वहाँ उनकी नजर एक बच्चे की असहायता पर पड़ी।कुछ दिनों पहले भी उन्होंने एक दिव्यांग श्रद्धालु की व्हीलचेयर थामकर उसे सुरक्षित मार्ग दिलाया था। किसी कैमरे की मौजूदगी नहीं थी, न कोई मंच, न कोई भाषण फिर भी यह मानवीयता का सबसे गरिमामय क्षण था। हमारे समय का सबसे बड़ा संकट यह है कि कर्तव्य और संवेदना को हम अलग-अलग खानों में बाँट देते हैं, कानून-व्यवस्था जहाँ हो, वहाँ मानवीय स्पर्श खोता सा लगता है।लेकिन अयोध्या से मिल रही ऐसी खबरें बताती हैं,कानून तभी आदरणीय है, जब वह इंसानियत के साथ चलता है।परिक्रमा मार्ग पर पुलिस की चौकन्नी मुस्तैदी जितनी जरूरी है,उतनी ही जरूरी है विश्वास पैदा करने वाली सेवा भावना। और यही विश्वास, यही भरोसा लोकतंत्र और समाज की सबसे मजबूत नींव है। हमें ये उदाहरण केवल खबर तक सीमित नहीं रखने चाहिए। यह पूरे प्रशासनिक तंत्र के लिए मानक बनें कि रक्षक वही कहलाने योग्य है जो केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सहारा भी देता है।अयोध्या में रामलला का बाल स्वरूप आशीर्वाद देता है, कि हम सबके भीतर भी सेवा और करुणा का बाल्यभाव जीवित रहे।और आज जब एक अधिकारी खोमचा उठाकर एक बच्चे की चिंता करता है,तो यह केवल एक घटना नहीं…यह संदेश है कानून का उद्देश्य दंड नहीं जनकल्याण है।
